बालाघाट। मध्य प्रदेश के बालाघाट के आदिवासी इलाकों में बच्चों की अचानक बिगड़ी तबीयत और मौतों के मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी थी। अब केंद्र की जांच से सामने आई तस्वीर में संकेत मिला है कि बच्चों की हालत बिगड़ने के पीछे किसी एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। कई बच्चों में एक साथ कई स्वास्थ्य समस्याएं पाई गईं, जिनमें खसरा, मलेरिया, सांस संबंधी परेशानी, शरीर में पानी की कमी, एनीमिया, कुपोषण और शॉक जैसी स्थितियां शामिल हैं।
इस पूरे मामले की जांच के लिए केंद्र और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीमें प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचीं। जांच का उद्देश्य बीमारी के पैटर्न को समझना, बच्चों की मौत के कारणों का पता लगाना और संक्रमण को आगे फैलने से रोकना है।
431 बच्चों को अस्पताल में कराया गया भर्ती
स्वास्थ्य विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अब तक 431 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें से 379 बच्चे उपचार के बाद स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं, जबकि 52 बच्चों का इलाज और निगरानी अभी जारी है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने जांच का दायरा शुरुआती प्रभावित गांवों से बढ़ाकर लगभग 50 गांवों तक कर दिया है। स्वास्थ्य टीमों ने अब तक 32 हजार से अधिक लोगों की जांच की है।
इस व्यापक स्क्रीनिंग का उद्देश्य उन बच्चों और परिवारों की पहचान करना है, जिनमें बीमारी के लक्षण मौजूद हैं या जो जोखिम वाले क्षेत्रों में रह रहे हैं।
केंद्रीय टीम ने प्रभावित इलाकों का किया दौरा
मामले को लेकर 4 अगस्त को राष्ट्रीय स्तर पर समीक्षा बैठक हुई थी। इसके बाद 12 अगस्त को विशेष केंद्रीय दल (NJORT) और ICMR की टीम को प्रभावित क्षेत्रों में भेजा गया।
इसके साथ ही जबलपुर मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ भी इलाके का दौरा कर रहे हैं। विशेषज्ञों की कोशिश यह समझने की है कि बच्चों में अलग-अलग बीमारियां किस तरह एक-दूसरे को गंभीर बना रही थीं।
रिपोर्ट के मुताबिक कई बच्चों में एक साथ संक्रमण, कुपोषण और अन्य स्वास्थ्य जटिलताएं मौजूद थीं। ऐसे मामलों में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण सामान्य संक्रमण भी गंभीर रूप ले सकता है।

मौतों की असली वजह पता करना बनी चुनौती
जांच टीम के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी रही कि शुरुआती दौर में कुछ बच्चों की मौत घर पर या अस्पताल पहुंचने से पहले हो गई। ऐसे मामलों में खून के नमूने, मेडिकल रिकॉर्ड और बीमारी के शुरुआती लक्षणों से जुड़ी जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी।
यही वजह है कि जांच अधिकारी अब प्रभावित परिवारों से घर-घर जाकर जानकारी जुटा रहे हैं। बच्चों को कब बुखार आया, क्या लक्षण दिखाई दिए, उन्हें कब अस्पताल ले जाया गया और इलाज के दौरान क्या स्थिति थी—इन सभी जानकारियों को जोड़कर मौतों की परिस्थितियों को समझने की कोशिश की जा रही है।
खसरा-रूबेला टीकाकरण पर जोर
बीमारी को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने टीकाकरण अभियान भी तेज किया है। 1 से 10 साल की उम्र के 14 हजार से अधिक बच्चों को खसरा-रूबेला का अतिरिक्त टीका लगाया गया है।
इसके अलावा प्रभावित इलाकों में स्वच्छता और मच्छर नियंत्रण पर भी जोर दिया गया है। 600 से ज्यादा पेयजल स्रोतों की सफाई कराई गई है, जबकि 4 हजार से अधिक घरों में मच्छररोधी दवा का छिड़काव किया गया।
दूर-दराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए छह मोबाइल मेडिकल वाहन भी लगाए गए हैं। इन वाहनों के जरिए डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मचारी उन बस्तियों तक पहुंच रहे हैं, जहां अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
7,711 बच्चे गंभीर कुपोषण की चपेट में
जांच के दौरान सामने आया कुपोषण का आंकड़ा भी चिंता बढ़ाने वाला है। करीब 7,711 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित पाए गए। इनमें से 518 बच्चों को पोषण सुधार केंद्रों में भर्ती कराया गया है।
इसके अलावा 13 हजार से ज्यादा बच्चों में दस्त और 274 बच्चों में निमोनिया की पहचान की गई। इन बच्चों को आवश्यक उपचार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
कुपोषण और संक्रमण का एक साथ होना बच्चों के लिए विशेष रूप से गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है। कमजोर पोषण स्थिति में शरीर संक्रमण से लड़ने की क्षमता खो सकता है और बीमारी तेजी से गंभीर हो सकती है।
क्या अब नियंत्रण में है स्थिति?
प्रशासन के मुताबिक जमीनी स्तर पर किए गए उपायों के बाद हालात में सुधार के संकेत मिले हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बीते एक सप्ताह में बालाघाट में खसरे का कोई नया मामला सामने नहीं आया है।
हालांकि, स्वास्थ्य विभाग अभी इसे पूरी तरह नियंत्रण में आने का अंतिम संकेत नहीं मान रहा है। आदिवासी और दूर-दराज की बस्तियों में लगातार निगरानी, स्क्रीनिंग, टीकाकरण और चिकित्सा सहायता जारी रखी जा रही है।
विशेषज्ञों के सामने अब सबसे अहम चुनौती यह है कि बच्चों में सामने आई अलग-अलग स्वास्थ्य समस्याओं के आपसी संबंध को पूरी तरह समझा जाए और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो।

