पटना। बिहार की राजधानी पटना में आरक्षण के मुद्दे को लेकर मंगलवार को माहौल गरमा गया। ‘आरक्षण बढ़ाओ, संविधान बचाओ’ आंदोलन के तहत दलित संगठनों और प्रदर्शनकारियों ने गांधी मैदान के आसपास जुटकर आरक्षण का दायरा बढ़ाने और सामाजिक न्याय से जुड़ी मांगों को लेकर आवाज बुलंद की। प्रदर्शनकारियों की ओर से गांधी मैदान से लोकभवन तक मार्च निकालने की तैयारी की गई है।
सुबह से ही अलग-अलग क्षेत्रों से प्रदर्शनकारी गांधी मैदान के आसपास पहुंचने लगे। प्रदर्शन में शामिल लोगों के हाथों में बैनर और झंडे दिखाई दिए। प्रदर्शनकारियों ने आरक्षण, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संविधान में दिए गए अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर नारेबाजी की।
आंदोलनकारियों का कहना है कि आरक्षण को केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक यह सामाजिक प्रतिनिधित्व, समान अवसर और उन समुदायों की भागीदारी से जुड़ा विषय है, जो लंबे समय से सामाजिक असमानता और भेदभाव का सामना करते रहे हैं।
गांधी मैदान से लोकभवन तक मार्च की तैयारी
प्रदर्शनकारियों की ओर से गांधी मैदान से लोकभवन तक मार्च निकालने की तैयारी की गई है। प्रस्तावित मार्च को देखते हुए पुलिस और प्रशासन ने भी सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है।
पटना के जेपी गोलंबर और डाकबंगला चौराहे पर बैरिकेडिंग की गई है। इन इलाकों में पुलिस बल की तैनाती की गई है ताकि प्रदर्शन के दौरान स्थिति को नियंत्रित रखा जा सके और यातायात व्यवस्था प्रभावित न हो।
प्रशासन की ओर से मुख्य रूप से कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आम लोगों को होने वाली असुविधा को कम करने पर जोर दिया जा रहा है। मार्च के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के सड़क पर आने की स्थिति में शहर के कुछ प्रमुख मार्गों पर यातायात प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई है।

आरक्षण के दायरे को बढ़ाने की मांग
आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने आरक्षण से जुड़ी कई मांगें सामने रखीं। इनमें सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण लागू करने, न्यायपालिका में आरक्षण की व्यवस्था करने और निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू करने की मांग शामिल है।
प्रदर्शनकारियों ने एससी-एसटी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने की मांग भी उठाई। उनका तर्क है कि केवल शुरुआती नियुक्ति के स्तर पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उच्च पदों तक पहुंच में भी सामाजिक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
समिति के संयोजक अमर आजाद ने कहा कि दलित और आदिवासी समाज के सामने आज भी जातिगत भेदभाव और अत्याचार की चुनौती मौजूद है। उनके अनुसार किसी व्यक्ति के उच्च पद पर पहुंच जाने के बाद भी सामाजिक भेदभाव की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होती।
उन्होंने एससी-एसटी समाज को मिलने वाले आरक्षण के विरोध पर भी सवाल उठाया और निजी क्षेत्र तथा न्यायपालिका में आरक्षण लागू करने की मांग दोहराई। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण और कॉलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने की मांग भी रखी।
बिहार में 65 प्रतिशत आरक्षण की मांग
पटना के इस आंदोलन में बिहार में 65 प्रतिशत आरक्षण की मांग भी प्रमुख मुद्दा रही। प्रदर्शनकारियों ने एससी, एसटी, ओबीसी और ईबीसी समुदायों के लिए आरक्षण का दायरा बढ़ाने की मांग की।
आंदोलनकारियों का कहना है कि पिछड़े, दलित और आदिवासी समुदायों की सामाजिक एवं जनसंख्या संबंधी स्थिति को देखते हुए आरक्षण व्यवस्था में विस्तार की आवश्यकता है। उनका दावा है कि आरक्षण के जरिए इन समुदायों को शिक्षा, रोजगार और संस्थागत प्रतिनिधित्व में अधिक अवसर मिल सकते हैं।
प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को संविधान में दिए गए अधिकारों और सामाजिक न्याय की अवधारणा से जोड़ते हुए सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की।
पुलिस-प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था की चुनौती
पटना में बड़े प्रदर्शन और प्रस्तावित मार्च को देखते हुए पुलिस-प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर प्रदर्शनकारियों को अपनी मांगें रखने का अधिकार देना है, वहीं दूसरी ओर शहर की यातायात व्यवस्था और कानून-व्यवस्था को सामान्य बनाए रखना भी जरूरी है।
जेपी गोलंबर और डाकबंगला चौराहे पर की गई बैरिकेडिंग और पुलिस बल की तैनाती इसी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है। प्रशासन की कोशिश है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से हो और किसी तरह की अप्रिय स्थिति पैदा न हो।
फिलहाल आंदोलन का केंद्र आरक्षण का दायरा बढ़ाने, सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और संविधान से जुड़े अधिकारों की रक्षा की मांग है। गांधी मैदान से लोकभवन तक प्रस्तावित मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों की संख्या और आगे की रणनीति पर भी नजर बनी हुई है।

