नई दिल्ली। ग्रेटर नोएडा में प्रस्तावित CJP यानी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के विरोध प्रदर्शन को लेकर एक लॉ स्टूडेंट को नोटिस भेजे जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। छात्र के खिलाफ जारी नोटिस पर बुधवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई और ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर सवाल उठाए।
मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने हुई। कोर्ट के सामने यह मुद्दा रखा गया कि एक छात्र को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में शामिल होने और उसके प्रचार से संबंधित गतिविधियों के चलते भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया था।
हालांकि बाद में मजिस्ट्रेट की ओर से यह नोटिस वापस ले लिया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को गंभीरता से लिया।
छात्र को आखिर क्यों भेजा गया नोटिस?
मामले के मुताबिक, ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने दूसरे वर्ष के एक लॉ स्टूडेंट को शांति बनाए रखने से संबंधित नोटिस जारी किया था।
बताया गया कि छात्र CJP के प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रचार कर रहा था। इसी सिलसिले में उसके खिलाफ BNSS की धारा 130 के तहत कार्रवाई की गई।
मामला तब ज्यादा गंभीर हो गया जब इसे सुप्रीम कोर्ट के उस पूर्व निर्देश के संदर्भ में देखा गया, जिसमें छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाए जाने की बात कही गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेट से पूछा- नोटिस कैसे जारी किया?
बुधवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब अदालत पहले ही इस तरह के मामलों में छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा चुकी थी, तो एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी कर दिया।
कोर्ट ने इस कार्रवाई को लेकर कड़ा रुख अपनाया।
CJI सूर्यकांत ने कथित तौर पर नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि मजिस्ट्रेट को ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे हुई, जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश स्पष्ट थे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी मजिस्ट्रेट सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी नहीं कर सकता।

पहले ही दिए गए थे स्पष्ट निर्देश
इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए निर्देश बताए जा रहे हैं। कोर्ट के सामने यह दलील रखी गई कि 1 सितंबर को देशव्यापी निर्देश जारी किए गए थे, जिनके तहत छात्र विरोध प्रदर्शनों के सिलसिले में छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने की बात कही गई थी।
इसी आधार पर अदालत ने सवाल किया कि जब ऐसा स्पष्ट निर्देश मौजूद था तो उसके बाद छात्र को नोटिस जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी FIR को पहले ही रद्द किया जा चुका है।
नोटिस वापस लिया, लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं
ग्रेटर नोएडा के मजिस्ट्रेट की ओर से छात्र को जारी किया गया नोटिस बाद में वापस ले लिया गया।
हालांकि नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इसे महज प्रशासनिक गलती मानकर नजरअंदाज नहीं किया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक आदेशों का पालन हर स्तर पर किया जाना जरूरी है।
इस मामले ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि जब किसी अदालत की ओर से किसी खास तरह की कार्रवाई पर स्पष्ट रोक लगाई गई हो, तो स्थानीय प्रशासन या मजिस्ट्रेट उस आदेश की व्याख्या किस तरह करता है।
सीनियर एडवोकेट ने कोर्ट के सामने उठाया मामला
यह पूरा मामला सीनियर एडवोकेट विश्वजीत भट्टाचार्य ने CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने मौखिक रूप से रखा।
उन्होंने अदालत को छात्र को भेजे गए नोटिस और उससे जुड़ी परिस्थितियों की जानकारी दी। इसके बाद बेंच ने एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से की गई कार्रवाई पर सवाल उठाए।
अदालत का मुख्य सवाल यही रहा कि पहले से मौजूद न्यायिक निर्देश के बावजूद छात्र के खिलाफ इस तरह का नोटिस जारी करने की जरूरत कैसे पड़ी।
छात्रों के प्रदर्शन और प्रशासन की कार्रवाई पर फिर बहस
इस मामले ने छात्र विरोध प्रदर्शनों और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच संतुलन को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है।
एक तरफ प्रशासन का तर्क आमतौर पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का होता है, जबकि दूसरी तरफ छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति के अधिकार से जुड़े सवाल सामने आते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से यह संकेत मिलता है कि अदालत अपने पूर्व निर्देशों के पालन को लेकर गंभीर है।
अब आगे क्या?
फिलहाल नोटिस वापस लिया जा चुका है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने मामले को महत्वपूर्ण बना दिया है। अब नजर इस बात पर होगी कि अदालत आगे इस मामले में कोई अतिरिक्त निर्देश जारी करती है या संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगती है।
मामले का व्यापक असर छात्र आंदोलनों से जुड़े दूसरे मामलों पर भी पड़ सकता है, खासकर वहां जहां स्थानीय प्रशासन की कार्रवाई और अदालत के पूर्व निर्देशों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होती है।
CJP प्रोटेस्ट से शुरू हुआ यह विवाद अब सिर्फ एक छात्र को भेजे गए नोटिस तक सीमित नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी प्रतिक्रिया ने न्यायिक आदेशों के पालन और छात्रों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

