नई दिल्ली। ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को जारी किए गए नोटिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई के दौरान जमकर नाराजगी देखने को मिली। मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है, जिन्हें कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से कथित तौर पर पांच लाख रुपये के निजी मुचलके का नोटिस दिया गया था।
मामला सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के सामने पहुंचा, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत कर रहे थे। वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने अदालत को बताया कि छात्र को यह नोटिस उस समय दिया गया, जब शीर्ष अदालत छात्र प्रदर्शनों से संबंधित मामले में पहले ही कुछ छात्रों के खिलाफ एफआईआर रद्द कर चुकी थी और भविष्य में उनके खिलाफ जबरन कार्रवाई पर रोक के निर्देश दे चुकी थी।
इस मामले ने इसलिए भी गंभीर रूप ले लिया क्योंकि संबंधित नोटिस बाद में वापस ले लिया गया। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर पहले से स्पष्ट आदेश मौजूद था तो उसके बाद छात्र के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई शुरू ही कैसे की गई।
छात्र को आखिर नोटिस क्यों दिया गया?
जानकारी के मुताबिक, 4 सितंबर 2026 को जारी नोटिस में पुलिस की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया था। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे थे।
पुलिस की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि छात्र अन्य विद्यार्थियों को कॉकरेच जनता पार्टी यानी CJP के प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे।
पुलिस रिपोर्ट में कथित गतिविधियों की वजह से इलाके में तनाव पैदा होने और भविष्य में लड़ाई-झगड़े या शांति भंग होने की आशंका जताई गई थी। इसी आधार पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने BNSS की धाराओं 126 और 135 के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार माना।
हालांकि, इन आरोपों को छात्र की ओर से स्वीकार किया गया है, ऐसा इस रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं होता। इसलिए पूरे मामले में पुलिस के आरोप और छात्र का पक्ष अलग-अलग देखना महत्वपूर्ण है।

पांच लाख रुपये के मुचलके ने बढ़ाया विवाद
कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से छात्र को जारी नोटिस में कारण बताओ जवाब मांगा गया था। इसमें पूछा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए छात्र से पांच लाख रुपये का निजी मुचलका क्यों न लिया जाए।
इतना ही नहीं, दो जमानतदारों से भी पांच-पांच लाख रुपये के मुचलके की मांग किए जाने की बात सामने आई।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि नोटिस पर कार्रवाई होने वाली थी। हालांकि, मामला सामने आने और प्रेस में रिपोर्ट होने के बाद संबंधित नोटिस वापस ले लिया गया।
वकील ने अदालत के सामने चिंता जताई कि इस तरह की कार्रवाई छात्रों के बीच डर पैदा कर सकती है, खासकर तब जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मामले में छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई को लेकर स्पष्ट निर्देश दे चुका हो।
नोटिस वापस हुआ तो फिर सुप्रीम कोर्ट नाराज क्यों?
सुनवाई के दौरान जब अदालत को बताया गया कि नोटिस वापस लिया जा चुका है, तो जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि ऐसी स्थिति में अब कार्रवाई का आधार क्या बचता है।
इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि केवल नोटिस वापस ले लेने से कथित तौर पर अदालत के आदेश की अवहेलना का मुद्दा खत्म नहीं हो जाता।
यही वह बिंदु था, जहां सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कथित तौर पर सवाल उठाया कि जब शीर्ष अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए थे तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी कर दिया।
सुनवाई के दौरान सीजेआई की टिप्पणी बेहद सख्त रही। उन्होंने सवाल किया कि मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की।
अब संबंधित अधिकारी से मांगा जा सकता है जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता से संबंधित नोटिस को याचिका के जरिए रिकॉर्ड पर लाने को कहा है। अदालत ने संकेत दिया कि वह संबंधित अधिकारी से इस कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण मांग सकती है।
यानी नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अब अदालत यह देख सकती है कि शीर्ष अदालत के पहले के आदेश के बावजूद छात्र के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का आधार क्या था और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी की भूमिका क्या रही।
छात्रों की कार्रवाई से जुड़ा मामला फिर चर्चा में
ग्रेटर नोएडा का यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब छात्र प्रदर्शनों और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर पहले से ही कानूनी बहस चल रही है।
एक तरफ प्रशासन और पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी का हवाला देते हैं, वहीं दूसरी तरफ छात्रों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर यह सवाल उठता रहा है कि विरोध या प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।
अक्षत त्रिपाठी को जारी नोटिस अब वापस लिया जा चुका है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संबंधित अधिकारी अदालत के सामने इस कार्रवाई का क्या कारण बताते हैं और क्या सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे कोई निर्देश जारी करता है।

