नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के बीच पश्चिम एशिया की कूटनीति पर भी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। सम्मेलन के इतर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात ने खासा ध्यान खींचा है।
दोनों नेताओं की बैठक में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा हुई। अबू धाबी के आधिकारिक मीडिया कार्यालय के मुताबिक, दोनों पक्षों ने तनाव कम करने, क्षेत्रीय स्थिरता मजबूत करने और शांति एवं विकास के प्रयासों को आगे बढ़ाने के महत्व पर जोर दिया।
इस मुलाकात का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि ईरान और UAE पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव के बीच बेहद संवेदनशील कूटनीतिक परिस्थिति में हैं।
ईरान-UAE मुलाकात से क्यों बढ़ी उम्मीद?
BRICS सम्मेलन में ईरान और UAE दोनों की मौजूदगी ने दिल्ली को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच बना दिया है। पेजेशकियान और क्राउन प्रिंस की मुलाकात को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
रॉयटर्स के मुताबिक, दोनों देशों ने BRICS के संयुक्त बयान का समर्थन किया, जिसमें मध्य पूर्व के संघर्ष के बीच संयम बरतने, नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक व्यापार तथा समुद्री स्थिरता की रक्षा पर जोर दिया गया।
हालांकि, इस बैठक को किसी अंतिम समझौते या तनाव के पूरी तरह खत्म होने की घोषणा के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। फिलहाल यह बातचीत तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक संपर्क के तौर पर महत्वपूर्ण है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी दुनिया की नजर
इस पूरे घटनाक्रम के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बना हुआ है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा और व्यापार के लिए बेहद अहम है।
रिपोर्टों में ईरान की ओर से क्षेत्रीय देशों के साथ होर्मुज से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की संभावनाओं का उल्लेख किया गया है। ऐसे में पेजेशकियान की दिल्ली यात्रा और UAE नेतृत्व के साथ उनकी मुलाकात को पश्चिम एशिया में संभावित कूटनीतिक प्रयासों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
भारत के लिए भी समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेजेशकियान के साथ बातचीत में स्वतंत्र नौवहन, वाणिज्य और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर भारत की स्थिति दोहराई थी।

BRICS में पश्चिम एशिया बना बड़ा मुद्दा
नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन के दौरान पश्चिम एशिया का संघर्ष प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दों में शामिल रहा। 11 सदस्यीय BRICS ने क्षेत्रीय तनाव को लेकर चिंता जताई और कूटनीतिक समाधान की जरूरत पर जोर दिया।
AP की रिपोर्ट के अनुसार, BRICS नेताओं ने मध्य पूर्व और यूक्रेन से जुड़े संघर्षों पर चिंता जताई तथा अंतरराष्ट्रीय कानून और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर जोर दिया।
इससे स्पष्ट है कि BRICS अब सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। वैश्विक संघर्ष, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्ग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे भी इसके एजेंडे का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
आज पुतिन की दिल्ली यात्रा का समापन?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी BRICS शिखर सम्मेलन के लिए दिल्ली पहुंचे थे। सम्मेलन के दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं के साथ मुलाकातें हुईं।
रूस और भारत के रिश्तों के लिहाज से पुतिन की यात्रा महत्वपूर्ण रही। BRICS के व्यापक एजेंडे में रूस-भारत सहयोग के साथ-साथ ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक कूटनीति से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में रहे।
आपके दिए कार्यक्रम के अनुसार पुतिन के रविवार को दिल्ली से रूस रवाना होने की संभावना है। उनके प्रस्थान के साथ दिल्ली में BRICS नेताओं की इस उच्चस्तरीय यात्रा का एक अहम चरण पूरा होगा।
भारत के लिए क्यों अहम है पूरा घटनाक्रम?
BRICS सम्मेलन के दौरान भारत एक साथ रूस, ईरान, UAE और चीन जैसे महत्वपूर्ण देशों के नेताओं के साथ संवाद कर रहा है। यही भारत की वर्तमान कूटनीतिक भूमिका को खास बनाता है।
ईरान के साथ भारत के संबंधों में चाबहार बंदरगाह और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जबकि रूस भारत का लंबे समय से रणनीतिक साझेदार है। दूसरी तरफ UAE भारत का प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है।
प्रधानमंत्री मोदी और पेजेशकियान की बैठक में भी दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तथा पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता के लिए संवाद एवं कूटनीति पर जोर दिया था।
क्या दिल्ली से निकलेगा पश्चिम एशिया के लिए कोई संदेश?
BRICS सम्मेलन से फिलहाल सबसे बड़ा संदेश यही निकल रहा है कि सदस्य देश क्षेत्रीय संघर्षों के बीच संवाद और तनाव कम करने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।
पेजेशकियान और UAE क्राउन प्रिंस की मुलाकात इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक तस्वीर पेश करती है। हालांकि, इससे क्षेत्रीय संघर्ष तुरंत खत्म हो जाएगा या होर्मुज से जुड़े सभी विवाद सुलझ जाएंगे, ऐसा दावा अभी नहीं किया जा सकता।
लेकिन दिल्ली में हुई यह मुलाकात यह जरूर दिखाती है कि संकट के बीच भी बातचीत के रास्ते खुले हुए हैं।

