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    Home»देश»जेवर बेचकर मां ने खरीदा था अपना आशियाना, बेटों पर फ्लैट हड़पने का आरोप; मौत आई तो चारों ने मुंह मोड़ा, समाजसेवियों ने दी अंतिम विदाई
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    जेवर बेचकर मां ने खरीदा था अपना आशियाना, बेटों पर फ्लैट हड़पने का आरोप; मौत आई तो चारों ने मुंह मोड़ा, समाजसेवियों ने दी अंतिम विदाई

    Chandra JyotiBy Chandra JyotiSeptember 20, 2026No Comments5 Mins Read
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    इंदौर: से सामने आई एक बुजुर्ग मां की कहानी ने परिवार, रिश्तों और इंसानियत को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। लता बाई नाम की बुजुर्ग महिला ने कथित तौर पर अपनी जिंदगी की जमा पूंजी और जेवर बेचकर फ्लैट खरीदा था। लेकिन संस्था से जुड़े लोगों के मुताबिक, बाद में उनके एक बेटे ने कथित रूप से वह फ्लैट अपने नाम करा लिया और लता बाई को घर से बाहर होना पड़ा। इसके बाद उनकी जिंदगी वृद्धाश्रम में गुजरी और जब अस्पताल में उनका निधन हुआ तो संस्था के अनुसार उनके चारों बेटे अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए।

    जेवर बेचकर खरीदा था फ्लैट

    यह मामला इंदौर के सिलिकॉन सिटी इलाके की गणेश रेसिडेंसी से जुड़ा बताया जा रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, लता बाई ने लंबे समय तक मेहनत करके जमा की गई रकम और अपने जेवर बेचकर रहने के लिए फ्लैट खरीदा था।

    संस्था से जुड़े लोगों का आरोप है कि बाद में उनके एक बेटे ने कथित तौर पर फ्लैट अपने नाम करा लिया। इसके बाद बुजुर्ग महिला को घर से बाहर कर दिया गया। हालांकि, इस पूरे मामले में लता बाई के बेटों का पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। इसलिए संपत्ति के हस्तांतरण की परिस्थितियों और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार है।

    बेघर हुईं तो समाजसेवियों ने बढ़ाया मदद का हाथ

    घर से बाहर होने के बाद लता बाई के सामने रहने की गंभीर समस्या खड़ी हो गई। इसी दौरान उनकी स्थिति की जानकारी प्रीयु फाउंडेशन से जुड़े अजय नागदा को मिली।

    संस्था से जुड़े लोगों ने उनकी मेडिकल जांच कराई और इसके बाद उन्हें जानकी वृद्धाश्रम में आश्रय दिलाया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, लता बाई ने अपने जीवन के करीब आठ महीने वृद्धाश्रम में बिताए। इस दौरान संस्था और आश्रम के लोग उनकी देखभाल करते रहे।

    इन आठ महीनों में उनके परिवार की ओर से उनसे संपर्क या नियमित देखभाल को लेकर भी सवाल उठे हैं। हालांकि, इस संबंध में बेटों का पक्ष सामने नहीं आया है, इसलिए परिवार की तरफ से किसी संभावित सफाई को शामिल करना अभी संभव नहीं है।

    अचानक बिगड़ी तबीयत, MY अस्पताल में कराया गया भर्ती

    वृद्धाश्रम में रहने के दौरान लता बाई की तबीयत अचानक खराब हो गई। इसके बाद उन्हें इलाज के लिए इंदौर के एमवाय अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने उपचार किया, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी और इलाज के दौरान उनका निधन हो गया।

    मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल उनके अंतिम संस्कार को लेकर खड़ा हुआ। संस्था के मुताबिक, ॐ शांति आश्रम की ब्रह्मकुमारी ज्योति दीदी के माध्यम से चारों बेटों को लता बाई के निधन की जानकारी दी गई थी।


    मौत की खबर मिली, फिर भी अंतिम यात्रा में नहीं पहुंचे बेटे

    संस्था का दावा है कि लता बाई के निधन की जानकारी उनके चारों बेटों तक पहुंचाई गई, लेकिन इसके बावजूद कोई भी बेटा अंतिम संस्कार के लिए नहीं आया। संस्था ने यह भी कहा कि बेटों ने मां को मुखाग्नि देने से इनकार किया।

    एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, लता बाई का शव कुछ समय तक अस्पताल के शवगृह में रहा और बाद में समाजसेवियों ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई।

    यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बेटों के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचने और फ्लैट से जुड़े आरोपों की जानकारी मुख्य रूप से संस्था तथा मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। बेटों का पक्ष उपलब्ध रिपोर्टों में सामने नहीं आया है।

    जिनसे खून का रिश्ता नहीं था, वही बने आखिरी सहारे

    जब परिवार की तरफ से कोई आगे नहीं आया, तो प्रीयु फाउंडेशन और जानकी वृद्धाश्रम से जुड़े सेवादारों ने लता बाई की अंतिम विदाई की जिम्मेदारी संभाली।

    जरूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनकी पार्थिव देह को रीजनल पार्क मुक्तिधाम ले जाया गया। वहां समाजसेवियों ने पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया।

    यानी जीवन के आखिरी महीनों में जिस संस्था और वृद्धाश्रम ने उन्हें सहारा दिया, अंतिम समय में वही लोग उनके साथ खड़े हुए।

    वरिष्ठ नागरिक कानून में क्या है प्रावधान?

    भारत में Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 वरिष्ठ नागरिकों और माता-पिता के भरण-पोषण तथा कल्याण से संबंधित कानूनी व्यवस्था देता है। कानून के अनुसार, जरूरतमंद माता-पिता अपने बच्चों से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं। कानून में भोजन, कपड़े, आवास और चिकित्सा देखभाल जैसी जरूरतों को maintenance में शामिल किया गया है।

    इसके अलावा, यदि किसी वरिष्ठ नागरिक ने इस शर्त के साथ संपत्ति ट्रांसफर की है कि प्राप्तकर्ता उसकी बुनियादी जरूरतों और शारीरिक आवश्यकताओं की देखभाल करेगा और ऐसा व्यक्ति उस दायित्व को पूरा नहीं करता, तो कुछ परिस्थितियों में ट्रिब्यूनल उस संपत्ति हस्तांतरण को शून्य घोषित कर सकता है। कानून में वरिष्ठ नागरिक को जानबूझकर छोड़ने यानी abandonment के लिए दंड का भी प्रावधान है।

    हालांकि, किसी खास संपत्ति विवाद में कानून का लागू होना दस्तावेजों, संपत्ति हस्तांतरण की शर्तों और मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। इसलिए लता बाई के मामले में भी कानूनी निष्कर्ष जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

    इस घटना ने खड़े किए कई सवाल

    लता बाई की कहानी सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बुजुर्गों की सुरक्षा और संपत्ति से जुड़े विवादों पर भी सवाल खड़े करती है। अगर किसी बुजुर्ग की संपत्ति उसके जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है, तो उसके हस्तांतरण से पहले कानूनी दस्तावेजों और शर्तों को समझना बेहद जरूरी है।

    वहीं, परिवार से अलग रहने वाले बुजुर्गों के लिए सामाजिक संस्थाओं और प्रशासनिक सहायता की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

    लता बाई की अंतिम यात्रा में उनके बेटों की गैरमौजूदगी की खबर ने लोगों को भावुक किया है। लेकिन इस मामले के हर कानूनी और पारिवारिक पहलू पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित पक्षों के बयान और जांच के बाद ही सामने आ सकेगा।

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