नई दिल्ली: मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहा विवाद अब और ज्यादा राजनीतिक हो गया है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि यदि चुनाव प्रक्रिया में गैरकानूनी तरीके से हस्तक्षेप या मतदाता सूची में छेड़छाड़ की गई है तो जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि ऐसी स्थिति में CEC पर ‘देशद्रोह’ के लिए मुकदमा चलाया जाना चाहिए। हालांकि, ये प्रियंका गांधी के राजनीतिक आरोप और मांग हैं; इन्हें किसी अदालत या जांच एजेंसी द्वारा स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आखिर SIR पर इतना बड़ा विवाद क्यों?
दरअसल, विवाद की शुरुआत उस रिपोर्ट के बाद हुई जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनावी प्रक्रिया और SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर कथित तौर पर 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
इन आपत्तियों से जुड़े मुद्दों में नए मतदाताओं के नाम जोड़ना, मतदाताओं के नाम हटाना या दोबारा बहाल करना, Form-6 में बदलाव और चुनावी सूची के प्रबंधन से जुड़ी तकनीकी व्यवस्था जैसे विषय शामिल बताए गए।
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। कांग्रेस समेत कई विपक्षी नेताओं ने मामले की जांच और चुनाव आयोग के कामकाज में जवाबदेही की मांग की।
प्रियंका गांधी ने क्या कहा?
केरल के वायनाड में पत्रकारों से बातचीत के दौरान प्रियंका गांधी ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया के साथ छेड़छाड़ लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर हमला है।
उनका आरोप था कि अगर मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए और जिम्मेदार अधिकारी इस बारे में जानते हुए भी कार्रवाई नहीं करते हैं, तो ऐसे मामलों में कानूनी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
प्रियंका गांधी ने यह भी कहा कि यदि CEC ने कोई गैरकानूनी काम किया है तो उन्हें सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत अभियोजन का सामना करना चाहिए। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कथित हस्तक्षेप को ‘देशद्रोह’ की संज्ञा दी।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रियंका गांधी का यह बयान राजनीतिक मांग और आरोप है। CEC ज्ञानेश कुमार को किसी अदालत ने इस मामले में दोषी नहीं ठहराया है।

चुनाव आयोग का क्या जवाब है?
विवाद के बीच चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद के दावों पर अपना पक्ष रखा है। आयोग का कहना है कि किसी भी संस्थान में अधिकारियों या सदस्यों की ओर से अलग-अलग सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है।
EC के मुताबिक, व्यक्तिगत टिप्पणियां या सुझाव अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं होते। आयोग ने कहा कि पिछले एक वर्ष के उसके आदेश और फैसले पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। SIR से जुड़े फैसलों को लेकर भी आयोग ने यही रुख दोहराया है।
यानी एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का दावा है, तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग कह रहा है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। यही अंतर मौजूदा राजनीतिक विवाद का प्रमुख आधार बना हुआ है।
मतदाता सूची में नाम हटाने का मुद्दा
प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने का मामला बेहद गंभीर है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संविधान से जुड़ा मुद्दा बताया।
हालांकि, इस आंकड़े और उससे जुड़े आरोपों की व्याख्या राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के बीच विवादित है। इसलिए इसे सीधे ‘फर्जी वोटर हटाना’ या ‘जानबूझकर वोट काटना’ बताना तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं होगा। इस विषय में आयोग की प्रक्रिया, आधिकारिक आंकड़ों और संबंधित दस्तावेजों को देखना जरूरी है।
राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने भी उठाए सवाल
प्रियंका गांधी से पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी SIR और मतदाता सूची से जुड़े आरोपों को लेकर चुनाव आयोग पर तीखा हमला किया था। राहुल गांधी ने कथित ‘वोट चोरी’ को संविधान पर हमला बताते हुए चुनाव आयोग, BJP और RSS पर गंभीर आरोप लगाए।
अन्य विपक्षी नेताओं ने भी चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए और कुछ ने CEC को हटाने या उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि संस्थागत निर्णय प्रक्रिया में अलग-अलग सुझावों को ‘असहमति’ या अंतिम निर्णय के विरोध के रूप में देखना सही नहीं है।
अब आगे क्या होगा?
SIR विवाद अब केवल मतदाता सूची के तकनीकी संशोधन तक सीमित नहीं रहा है। मामला चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता, आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली और राजनीतिक दलों के विश्वास से भी जुड़ गया है।
आगे इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका आधिकारिक दस्तावेजों, SIR से जुड़े वास्तविक आंकड़ों और चुनाव आयोग के निर्णयों की होगी। यदि किसी स्तर पर नियमों के उल्लंघन का प्रमाण सामने आता है तो संबंधित संस्थाएं कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर सकती हैं। फिलहाल सार्वजनिक रूप से सामने आए आरोपों और आयोग के जवाब के बीच स्पष्ट मतभेद जरूर दिखाई दे रहा है, लेकिन किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक दोष सिद्ध होने का निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता।

