नई दिल्ली: आने वाले वर्षों में दुनिया की ताकत का संतुलन किस तरह बदलेगा और इस बदलती व्यवस्था में भारत की जगह कहां होगी? विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस सवाल पर ऐसा आकलन दिया है, जिसने भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर चर्चा तेज कर दी है। उन्होंने कहा कि अगले पांच से दस वर्षों में भारत वैश्विक शक्ति क्रम में तेजी से ऊपर उठ सकता है। उनके मुताबिक भारत की तेज आर्थिक वृद्धि, अनुकूल जनसांख्यिकीय स्थिति और नए आर्थिक अवसर इस बदलाव के प्रमुख आधार बन सकते हैं।
जयशंकर का यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया में शक्ति का पारंपरिक संतुलन बदल रहा है। अमेरिका और चीन अभी भी वैश्विक प्रभाव के प्रमुख केंद्र हैं, लेकिन भारत समेत कई देश अपनी स्वतंत्र रणनीतिक भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत की आर्थिक और कूटनीतिक क्षमता को लेकर जयशंकर का आकलन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पांच से दस साल में भारत की बड़ी छलांग?
जयशंकर ने भारत के अगले पांच से दस वर्षों की संभावनाओं पर बात करते हुए कहा कि देश वैश्विक शक्ति के क्रम में तेजी से आगे बढ़ने की स्थिति में है। उन्होंने इसके लिए केवल कूटनीतिक प्रभाव को जिम्मेदार नहीं माना, बल्कि भारत की आर्थिक क्षमता और जनसंख्या संरचना को भी महत्वपूर्ण आधार बताया।
उनके मुताबिक लगातार ऊंची आर्थिक वृद्धि भारत के लिए सबसे बड़े अवसरों में से एक है। यदि यह वृद्धि लंबे समय तक कायम रहती है और इसके साथ रोजगार, निवेश, विनिर्माण तथा तकनीक से जुड़े अवसर बढ़ते हैं, तो इसका सीधा असर देश की वैश्विक क्षमता पर पड़ सकता है।
हालांकि, जयशंकर का बयान किसी निश्चित वैश्विक रैंक की घोषणा नहीं है। उन्होंने भारत के तेजी से ऊपर आने की संभावना पर बात की है। वास्तविक स्थिति आर्थिक प्रदर्शन, तकनीकी क्षमता, सैन्य शक्ति, वैश्विक संस्थानों में प्रभाव और अन्य कई कारकों पर निर्भर करेगी।
भारत की जनसांख्यिकी क्यों है महत्वपूर्ण?
विदेश मंत्री ने भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति को भी उसकी संभावित ताकत का आधार बताया। बड़ी और अपेक्षाकृत युवा आबादी भारत के लिए आर्थिक अवसर पैदा कर सकती है, लेकिन इसके लिए पर्याप्त रोजगार, कौशल और उत्पादकता बढ़ाना जरूरी होगा।
युवा आबादी तभी आर्थिक ताकत में बदल सकती है जब उसे शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर मिलें। इसलिए आने वाले वर्षों में भारत की वैश्विक स्थिति केवल जनसंख्या के आकार से नहीं, बल्कि उस आबादी की आर्थिक उत्पादकता से भी तय होगी।
दुनिया की शक्ति व्यवस्था बदल रही है
जयशंकर के बयान का एक बड़ा संदर्भ बदलती वैश्विक व्यवस्था है। आज दुनिया को केवल एक या दो शक्ति केंद्रों के नजरिये से नहीं देखा जा रहा। कई देश अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हुए अलग-अलग देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहे हैं।
भारत भी इसी तरह की रणनीति पर जोर देता रहा है। नई दिल्ली अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक एवं तकनीकी सहयोग बढ़ाते हुए रूस समेत अन्य देशों के साथ अपने संबंध भी बनाए रखता है। इसे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ा जाता है।
जयशंकर पहले भी इस बात पर जोर दे चुके हैं कि भारत का उत्थान दूसरे देशों की कमजोरियों या गलतियों पर निर्भर नहीं होना चाहिए, बल्कि देश की अपनी ताकत और क्षमताओं से निर्धारित होना चाहिए।
सिर्फ अर्थव्यवस्था से नहीं बनेगी वैश्विक ताकत
किसी देश का वैश्विक शक्ति के रूप में उभरना केवल GDP बढ़ने से तय नहीं होता। आर्थिक क्षमता के साथ सैन्य शक्ति, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक प्रभाव, वैश्विक संस्थानों में भूमिका और संकट के समय निर्णय लेने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है।
भारत पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक मंचों पर अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों को उठाने से लेकर विभिन्न देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी तक, भारत अपनी कूटनीतिक पहुंच का विस्तार कर रहा है।
मु्यूनिख सिक्योरिटी रिपोर्ट 2025 में शामिल एक सर्वेक्षण में भी भारत की शक्ति को अगले दस वर्षों में बढ़ने की धारणा सामने आई थी। उस सर्वे में भारत के लिए वर्तमान शक्ति के मुकाबले दस साल बाद की अनुमानित शक्ति में वृद्धि दिखाई गई थी। हालांकि यह विशेषज्ञों/उत्तरदाताओं की धारणा का सर्वेक्षण है, किसी भविष्य की निश्चित रैंकिंग का आधिकारिक पूर्वानुमान नहीं।
भारत के सामने चुनौतियां भी कम नहीं
भारत के लिए वैश्विक शक्ति बनने की राह में कई चुनौतियां हैं। तेज आर्थिक विकास को लंबे समय तक बनाए रखना, रोजगार पैदा करना, विनिर्माण और तकनीकी क्षमता बढ़ाना, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा बुनियादी ढांचे को मजबूत करना इनमें प्रमुख हैं।
इसके अलावा चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, पश्चिम एशिया में अस्थिरता, रूस-पश्चिम तनाव और वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बदलाव जैसी परिस्थितियां भी भारत की विदेश नीति को प्रभावित करती हैं।
ऐसे माहौल में भारत के लिए एक साथ कई शक्ति केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखना आसान नहीं होगा। यही कारण है कि रणनीतिक स्वायत्तता को भारत की विदेश नीति में लगातार महत्व दिया जा रहा है।
जयशंकर के बयान का बड़ा संकेत क्या है?
जयशंकर का आकलन मूल रूप से भारत की दीर्घकालिक क्षमता पर केंद्रित है। इसका संकेत यह है कि आने वाला दशक भारत के लिए निर्णायक हो सकता है। यदि आर्थिक वृद्धि, मानव संसाधन, तकनीक और रणनीतिक क्षमता में लगातार सुधार होता है, तो भारत की वैश्विक भूमिका बढ़ सकती है।
लेकिन पांच या दस साल बाद भारत की वास्तविक स्थिति कितनी बदलेगी, यह अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और कई अप्रत्याशित घटनाएं भविष्य की दिशा प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए जयशंकर के बयान को एक संभावित वैश्विक उभार का आकलन समझना ज्यादा उचित होगा, न कि किसी तय तारीख तक भारत के किसी निश्चित पायदान पर पहुंचने की घोषणा।

