नई दिल्ली: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर पोस्ट और अकाउंट प्रतिबंधित किए जाने को लेकर विवाद तेज हो गया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता अभिजीत दीपके ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि सोशल मीडिया से पोस्ट हटाने या अकाउंट बंद करने से लोगों के सवाल खत्म नहीं होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी कार्रवाई से सरकार के प्रति लोगों का अविश्वास और बढ़ सकता है।
दीपके ने बुधवार, 28 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए अपनी बात रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की आलोचना करने वाली पोस्ट और अकाउंट हटाए जा रहे हैं। हालांकि, पोस्ट और अकाउंट हटाए जाने के पीछे सरकार की भूमिका तथा कार्रवाई के वास्तविक दायरे को लेकर स्वतंत्र रूप से सभी दावों की पुष्टि नहीं हुई है।
‘अकाउंट हटाने से सवाल खत्म नहीं होंगे’
अभिजीत दीपके ने अपनी पोस्ट में कहा कि इंस्टाग्राम केवल एक ऐसा मंच है, जहां लोग अपने सवाल और चिंताएं सामने रखते हैं। उनके मुताबिक, इन सवालों की वजहें सोशल मीडिया से बाहर मौजूद हैं और अकाउंट हटाने से वे समस्याएं दूर नहीं होंगी।
दीपके ने यह भी कहा कि यदि लोगों की आवाज को प्रतिबंधित करने की कोशिश की जाती है, तो इससे उन लोगों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है, जिनके प्रति सरकार जवाबदेह है।
उनके बयान के केंद्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकार की आलोचना करने के अधिकार से जुड़ा सवाल है। हालांकि, सोशल मीडिया पर किसी सामग्री को हटाने के हर मामले के पीछे एक ही कारण हो, यह जरूरी नहीं है। किसी पोस्ट या अकाउंट पर कार्रवाई का आधार संबंधित आदेश, कानूनी प्रावधान और प्लेटफॉर्म की नीतियों से तय होता है।
आशुतोष रांका और वरुण ग्रोवर ने भी उठाए सवाल
इस विवाद के बीच CJP से जुड़े आशुतोष रांका ने भी इंस्टाग्राम अकाउंट और वीडियो प्रतिबंधित किए जाने का दावा किया। उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि भारत में हजारों अकाउंट प्रतिबंधित किए गए हैं और बड़ी संख्या में वीडियो हटाए गए हैं। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्ट में नहीं की गई है।
गीतकार और व्यंग्यकार वरुण ग्रोवर ने भी अपनी एक व्यंग्यात्मक कविता से जुड़े कंटेंट को इंस्टाग्राम से हटाए जाने की शिकायत की। उनके मुताबिक, यह कविता सरकार के ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य पर व्यंग्य करती थी।
इसके अलावा, कानूनी समाचार मंच LiveLaw ने भी दावा किया कि चुनाव आयोग के हलफनामे से संबंधित उसकी एक इंस्टाग्राम रील को प्रतिबंधित कर दिया गया। मंच के अनुसार, उसे प्लेटफॉर्म की ओर से बताया गया कि कंटेंट को प्रतिबंधित करने के लिए कानूनी अनुरोध मिला था।
इन शिकायतों ने सोशल मीडिया पर सरकारी आलोचना, कानूनी आदेशों और कंटेंट मॉडरेशन की पारदर्शिता को लेकर बहस तेज कर दी है। हालांकि, अलग-अलग मामलों में कार्रवाई के कारण और कानूनी आधार अलग हो सकते हैं।

‘Bring Back Ballot’ अकाउंट का मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा
इसी विवाद के बीच ‘Bring Back Ballot’ अभियान से जुड़े इंस्टाग्राम अकाउंट पर भारत में लगाई गई रोक को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। यह अभियान मिशन सेव कॉन्स्टिट्यूशन और अधिवक्ता महमूद प्राचा से जुड़ा बताया गया है।
याचिका के अनुसार, संबंधित इंस्टाग्राम अकाउंट को 10 अक्टूबर को प्रतिबंधित किया गया था। इसी दिन नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अभियान से जुड़ा शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किया गया था। याचिका में दावा किया गया कि अकाउंट पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के स्थान पर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग से जुड़ी सामग्री साझा की जाती थी।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि अकाउंट पर रोक लगाने से पहले उन्हें न तो नोटिस दिया गया और न ही कार्रवाई के कारणों या संबंधित आदेश की प्रति उपलब्ध कराई गई। ये याचिका में लगाए गए आरोप हैं; अदालत में इन पर अंतिम फैसला आना बाकी है।
हाईकोर्ट ने केंद्र और Meta से मांगा जवाब
27 अक्टूबर को न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार और संबंधित विभाग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। Meta Platforms की ओर से भी नोटिस स्वीकार किया गया। मामले की अगली सुनवाई 6 नवंबर के लिए निर्धारित बताई गई है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत की ओर से नोटिस जारी करना याचिका में लगाए गए आरोपों को सही ठहराने के समान नहीं है। इसका अर्थ है कि संबंधित पक्षों से मामले पर उनका जवाब मांगा गया है। आगे की सुनवाई में अदालत याचिका और जवाबों पर विचार करेगी।
इस मामले में सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत ऑनलाइन सामग्री को प्रतिबंधित करने की शक्तियों, आदेशों की पारदर्शिता और प्रभावित पक्षों को उपलब्ध कानूनी उपायों जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं।
सोशल मीडिया सेंसरशिप पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
सोशल मीडिया आज नागरिकों के लिए अपनी समस्याएं सामने रखने, सरकारी नीतियों पर प्रतिक्रिया देने और सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ऐसे में जब किसी पोस्ट या अकाउंट पर रोक लगती है, तो यह सवाल उठता है कि कार्रवाई किस आधार पर की गई और प्रभावित व्यक्ति को उसके खिलाफ अपील या कानूनी चुनौती देने का कितना अवसर मिला।
दूसरी ओर, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सामग्री को लेकर कानूनी अनुरोध और प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया भी कानून तथा संबंधित नियमों के दायरे में आती है। इसलिए हर मामले में आदेश का आधार, संबंधित सामग्री और लागू प्रक्रिया को देखना जरूरी है।
अभिजीत दीपके और अन्य लोगों की शिकायतों ने इस बहस को फिर सामने ला दिया है। अब नजर दिल्ली हाईकोर्ट में 6 नवंबर को होने वाली सुनवाई और संबंधित पक्षों के जवाब पर रहेगी।

