‘गंगा में चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं’, वाराणसी के चर्चित मामले पर सुप्रीम कोर्ट के जज की बड़ी टिप्पणी
नई दिल्ली। वाराणसी के चर्चित गंगा बिरयानी मामले पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जवल भुइयां की टिप्पणी चर्चा का विषय बन गई है। उन्होंने कहा कि गंगा नदी में चिकन बिरयानी खाना अपने आप में कोई अपराध नहीं है और केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को जेल भेजना उचित नहीं माना जा सकता। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नदी में कचरा या भोजन का बचा हुआ हिस्सा फेंकना पर्यावरण के लिहाज से गलत हो सकता है।
जस्टिस भुइयां ने यह टिप्पणी भोपाल स्थित एक विश्वविद्यालय में आयोजित व्याख्यान के दौरान की, जहां उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और नागरिक अधिकारों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे।
क्या है पूरा वाराणसी बिरयानी मामला?
यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर आयोजित एक इफ्तार पार्टी के दौरान कुछ युवकों द्वारा चिकन बिरयानी खाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था।
आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों ने बिरयानी खाने के बाद उसकी हड्डियां और अन्य अवशेष गंगा नदी में फेंके, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हुईं और नदी को प्रदूषित किया गया। इसके बाद पुलिस ने 14 मुस्लिम युवकों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
यह घटना राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनी और गिरफ्तारी को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

जस्टिस भुइयां ने क्या कहा?
व्याख्यान के दौरान जस्टिस उज्जवल भुइयां ने कहा कि—
“मुझे पूरा विश्वास है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। केवल बिरयानी खाने के आधार पर किसी को जेल नहीं भेजा जा सकता।”
उन्होंने कहा कि यदि किसी ने भोजन का बचा हुआ हिस्सा नदी में फेंका है, तो वह पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता के दृष्टिकोण से गलत हो सकता है। ऐसे मामलों में संबंधित कानूनों के अनुसार कार्रवाई हो सकती है, लेकिन सिर्फ चिकन बिरयानी खाने को अपराध नहीं माना जा सकता।
तीन महीने जेल में रहे थे आरोपी
जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में यह भी उल्लेख किया कि इस मामले में गिरफ्तार युवकों को करीब तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा। उन्होंने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि कई बार सामान्य गतिविधियों को भी आपराधिक मामला बना दिया जाता है, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जताई चिंता
अपने व्याख्यान में जस्टिस भुइयां ने व्यापक संदर्भ में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की भी चर्चा की।
उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और लोकतंत्र की मजबूती बहस, असहमति और संवाद से होती है। यदि सामान्य असहमति या विरोध को अपराध की तरह देखा जाएगा, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंच सकता है।
छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी किया जिक्र
जस्टिस भुइयां ने कहा कि कई बार पर्यावरण संरक्षण के लिए आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई की जाती है।
उन्होंने चिंता जताई कि कई मामलों में छात्रों को लंबे समय तक जमानत नहीं मिलती और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा उन्हें निलंबित भी कर दिया जाता है। ऐसी परिस्थितियां नागरिकों की मूल स्वतंत्रताओं को कमजोर कर सकती हैं।
कानूनी और सामाजिक बहस तेज
जस्टिस भुइयां की इस टिप्पणी के बाद वाराणसी बिरयानी मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मामले में अपराध का निर्धारण तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानूनों के आधार पर होना चाहिए।
दूसरी ओर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी इस बयान को लेकर विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। हालांकि यह स्पष्ट है कि न्यायाधीश की टिप्पणी किसी विशेष मामले के अंतिम न्यायिक निर्णय के रूप में नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक व्याख्यान के दौरान व्यक्त किए गए विचारों के रूप में सामने आई है।
वाराणसी बिरयानी मामले पर जस्टिस उज्जवल भुइयां की टिप्पणी ने नागरिक स्वतंत्रता, धार्मिक संवेदनशीलता, पर्यावरण संरक्षण और कानून के संतुलित उपयोग पर नई बहस छेड़ दी है। अब यह विषय केवल एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया पर व्यापक चर्चा का हिस्सा बन गया है।

