तमिलनाडु: के चर्चित करूर भगदड़ मामले में सोमवार को एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने राज्य सरकार द्वारा जारी उस सरकारी आदेश (जीओ) को रद्द कर दिया, जिसके तहत भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया गया था। अदालत का यह फैसला जनहित याचिकाओं (PIL) पर सुनवाई के बाद आया।
यह मामला पहले से ही राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा है और अब हाई कोर्ट के इस फैसले ने इसे एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले की जांच पहले से ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) कर रही है और जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जा रही है। ऐसे में राज्य सरकार द्वारा जारी सरकारी आदेश को कानूनी कसौटी पर परखा गया और उसे निरस्त कर दिया गया।
हाई कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
सुनवाई के दौरान मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि करूर भगदड़ मामले की जांच अभी जारी है और इसकी निगरानी सर्वोच्च न्यायालय कर रहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि जांच प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, इसलिए वह मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी।
हालांकि, अदालत ने राज्य सरकार के उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया जिसके माध्यम से मृतकों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की गई थी। अदालत का मानना था कि जब पूरा मामला न्यायिक और जांच प्रक्रिया के अधीन है, तब ऐसे प्रशासनिक आदेशों पर कानूनी समीक्षा आवश्यक है।
क्या था राज्य सरकार का फैसला?
मुख्यमंत्री विजय ने मुख्यमंत्री बनने के बाद 10 जुलाई को पहली बार करूर जिले का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने सितंबर 2025 में हुई करूर भगदड़ से प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास पैकेज की घोषणा की थी।
सरकार ने निर्णय लिया था कि भगदड़ में जान गंवाने वाले प्रत्येक परिवार के एक पात्र सदस्य को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी दी जाएगी। इसी योजना के तहत 41 मृतकों में से 32 पात्र परिजनों को नियुक्ति पत्र भी सौंपे गए थे।
राज्य सरकार ने इसे पीड़ित परिवारों को राहत और पुनर्वास प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया था।

जनहित याचिकाओं में क्या उठाए गए थे सवाल?
सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए कई जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकारी नौकरियां नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार दी जानी चाहिए तथा विशेष परिस्थितियों में लिए गए ऐसे फैसलों की न्यायिक समीक्षा आवश्यक है।
इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने सरकार के आदेश को रद्द कर दिया।
करूर दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ने क्या किया था?
करूर दौरे के दौरान मुख्यमंत्री विजय ने जिला कलेक्टर कार्यालय में मृतकों के परिजनों से मुलाकात की थी। उन्होंने प्रभावित परिवारों की समस्याएं सुनीं और पुनर्वास से जुड़े कई आश्वासन दिए।
इसके बाद आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने प्रभावित परिवारों के लिए सरकारी नौकरी, सहायता और अन्य राहत उपायों की घोषणा की थी। सरकार का कहना था कि यह कदम पीड़ित परिवारों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
सीबीआई जांच और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी क्यों महत्वपूर्ण?
करूर भगदड़ मामले की जांच फिलहाल सीबीआई के पास है। इसके अलावा इस जांच की निगरानी स्वयं सुप्रीम कोर्ट कर रहा है। ऐसे में मामले से जुड़े हर प्रशासनिक और कानूनी कदम पर न्यायिक नजर बनी हुई है।
हाई कोर्ट ने भी अपने फैसले में इसी पहलू को महत्वपूर्ण माना और कहा कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक मामले के तथ्यों और जिम्मेदारियों पर कोई अंतिम टिप्पणी उचित नहीं होगी।
आगे क्या हो सकता है?
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद तमिलनाडु सरकार के सामने कई कानूनी विकल्प मौजूद हैं। सरकार चाहे तो इस फैसले को उच्च स्तर पर चुनौती दे सकती है या फिर अदालत के निर्देशों के अनुरूप आगे की कार्रवाई कर सकती है।
दूसरी ओर, प्रभावित परिवारों की ओर से भी आगे की कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। फिलहाल सभी की नजर सीबीआई जांच और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में आगे होने वाली कार्रवाई पर बनी हुई है।
करूर भगदड़ मामले में मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक निर्णयों और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन की अहम मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी मामले की जांच सीबीआई कर रही हो और उसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट के पास हो, तब सरकार द्वारा जारी विशेष आदेशों की भी कानूनी समीक्षा संभव है। आने वाले समय में इस मामले में जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।

