गुजरात: हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी तलाक के आदेश का महिला के संपत्ति संबंधी अधिकारों और सामाजिक दर्जे पर सीधा प्रभाव पड़ता है, तो पति की मृत्यु के बाद भी वह उस आदेश को चुनौती दे सकती है। अदालत ने एक महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को रद्द कर दिया और उसके साथ ही महिला का विधवा का कानूनी दर्जा तथा पति की संपत्ति पर दावा करने का अधिकार भी बहाल कर दिया।
यह फैसला पारिवारिक कानून और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, क्योंकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल पति की मृत्यु हो जाने से पत्नी का अपील करने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक ईसाई दंपति से जुड़ा है, जिनकी शादी वर्ष 1976 में हुई थी। कई वर्षों बाद पति ने वर्ष 2020 में आनंद की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने उसे छोड़ दिया है और लंबे समय से साथ नहीं रह रही।
पत्नी ने उस समय तलाक की याचिका का विरोध नहीं किया। इसके बाद सितंबर 2022 में फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में तलाक का आदेश पारित कर दिया।
करीब डेढ़ वर्ष बाद, फरवरी 2024 में पति का निधन हो गया। इसके बाद अगस्त 2025 में महिला ने गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैमिली कोर्ट के तलाक के आदेश को चुनौती दी। उसने अपने छह बच्चों को भी इस मामले में पक्षकार बनाया।
हाई कोर्ट ने क्यों पलटा फैमिली कोर्ट का फैसला?
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आई. जे. वोरा और जस्टिस आर. टी. वछानी की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत ने कहा कि तलाक का आदेश केवल वैवाहिक संबंध समाप्त नहीं करता, बल्कि इसका सीधा असर पति-पत्नी के सामाजिक दर्जे, उत्तराधिकार और संपत्ति संबंधी अधिकारों पर भी पड़ता है। इसलिए यदि किसी पक्ष के कानूनी अधिकार प्रभावित हो रहे हों, तो वह आदेश के खिलाफ अपील कर सकता है, चाहे दूसरे पक्ष की मृत्यु ही क्यों न हो चुकी हो।
महिला के पक्ष में क्या रही मुख्य दलील?
महिला की ओर से अदालत में कहा गया कि पति के नाम पर संपत्ति थी, जो उनकी मृत्यु के बाद बच्चों के पास चली गई। यदि तलाक का आदेश बरकरार रहता, तो महिला को विधवा का दर्जा नहीं मिलता और वह पति की संपत्ति पर अपना कानूनी दावा भी नहीं कर पाती।
महिला ने यह भी तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने यह मान लिया था कि उसने जानबूझकर पति का साथ छोड़ दिया, जबकि ऐसा निष्कर्ष पर्याप्त आधार के बिना निकाला गया था।
हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए माना कि महिला के संपत्ति संबंधी अधिकारों की रक्षा के लिए तलाक का आदेश रद्द किया जाना आवश्यक है।

कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि तलाक के बाद पति-पत्नी पूर्व पति-पत्नी बन जाते हैं, जिससे दोनों के अधिकारों और दायित्वों में बड़ा बदलाव आता है। ऐसे आदेश का असर केवल वैवाहिक संबंध तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उत्तराधिकार, सामाजिक पहचान और आर्थिक अधिकारों पर भी पड़ता है।
अदालत ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष उचित नहीं था कि पत्नी ने जानबूझकर पति को छोड़ दिया था। उपलब्ध तथ्यों और महिला के अधिकारों को देखते हुए तलाक के आदेश को निरस्त करना न्यायसंगत है।
फैसले के बाद महिला को क्या लाभ मिलेगा?
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद महिला को दो महत्वपूर्ण कानूनी लाभ मिले हैं—
- महिला का विधवा का कानूनी दर्जा फिर से बहाल हो गया है।
- वह अब पति की संपत्ति पर कानून के अनुसार अपना दावा प्रस्तुत कर सकेगी।
हालांकि, संपत्ति का अंतिम बंटवारा संबंधित उत्तराधिकार कानूनों और सक्षम अदालत की प्रक्रिया के अनुसार तय होगा।
कानूनी दृष्टि से फैसले का महत्व
यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां तलाक का आदेश किसी व्यक्ति के उत्तराधिकार या संपत्ति संबंधी अधिकारों को प्रभावित करता है। अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि यदि किसी न्यायिक आदेश से किसी पक्ष के कानूनी अधिकार प्रभावित होते हैं, तो उस आदेश को चुनौती देने का अधिकार केवल दूसरे पक्ष की मृत्यु से समाप्त नहीं हो जाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बन सकता है।

