पाकिस्तान: के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में कराए जा रहे तथाकथित विधानसभा चुनावों को लेकर भारत ने एक बार फिर अपना स्पष्ट और सख्त रुख दोहराया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा है कि यह चुनावी प्रक्रिया किसी भी तरह से उस क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को नहीं बदल सकती, क्योंकि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है। मंत्रालय ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान इन चुनावों के जरिए अपने अवैध कब्जे को वैध दिखाने और क्षेत्र में मानवाधिकार उल्लंघनों से दुनिया का ध्यान हटाने की कोशिश कर रहा है।
विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में कराए जा रहे तथाकथित विधानसभा चुनावों से जुड़ी रिपोर्टों पर ध्यान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा केंद्र शासित प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है, जिसमें वे क्षेत्र भी शामिल हैं जो वर्तमान में पाकिस्तान के अवैध और जबरन कब्जे में हैं।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की यह चुनावी प्रक्रिया केवल एक औपचारिक और दिखावटी कवायद है, जिसका उद्देश्य वास्तविक स्थिति को बदलना नहीं बल्कि दुनिया के सामने एक अलग तस्वीर पेश करना है।
‘अवैध कब्जे पर पर्दा डालने की कोशिश’
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान इन चुनावों के जरिए अपने अवैध कब्जे को वैध साबित करने की कोशिश कर रहा है। मंत्रालय के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया स्थानीय लोगों के मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन, राजनीतिक दमन और आर्थिक समस्याओं से ध्यान हटाने का प्रयास है।
भारत का कहना है कि चुनाव कराने से किसी भी क्षेत्र की कानूनी स्थिति नहीं बदल जाती। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत लगातार यह दोहराता रहा है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र भारत के अभिन्न हिस्से हैं और उन पर पाकिस्तान का कोई वैध अधिकार नहीं है।
विरोध प्रदर्शनों का भी किया जिक्र
विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ समय से चल रहे व्यापक विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि वहां के लोग आर्थिक शोषण, प्रशासनिक दमन और अपने मौलिक अधिकारों से वंचित होने जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
मंत्रालय का कहना है कि स्थानीय जनता की नाराजगी को चुनावों के जरिए दबाया नहीं जा सकता। यदि वहां वास्तव में लोकतांत्रिक माहौल होता तो लोगों को अपने अधिकारों के लिए लगातार सड़कों पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ती।
भारत-चीन संबंधों पर भी दी जानकारी
प्रेस वार्ता के दौरान विदेश मंत्रालय ने भारत-चीन संबंधों को लेकर भी जानकारी साझा की। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि अगस्त 2025 में दोनों देशों ने तीन प्रमुख सीमा व्यापार मार्गों—लिपुलेख दर्रा, शिपकी ला और नाथू ला—के माध्यम से सीमा व्यापार दोबारा शुरू करने पर सहमति बनाई थी।
उन्होंने बताया कि विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने 27 और 28 जुलाई को चीन की आधिकारिक यात्रा की। इस दौरान उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के अंतरराष्ट्रीय विभाग की उप मंत्री सुन हैयान तथा विदेश मामलों की उप मंत्री हुआ चुनयिंग से मुलाकात की।

सीमा पर शांति और सहयोग पर चर्चा
विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच व्यापार, आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई।
इसके अलावा विदेश सचिव ने चीन के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से भी मुलाकात कर भविष्य में सहयोग की संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया। मंत्रालय ने कहा कि दोनों देशों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के महत्व को स्वीकार किया।
भारत का रुख पहले भी रहा स्पष्ट
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में कराए गए चुनावों का विरोध किया हो। इससे पहले भी भारत कई बार स्पष्ट कर चुका है कि पाकिस्तान द्वारा वहां कराई जाने वाली कोई भी राजनीतिक या प्रशासनिक प्रक्रिया भारत की संप्रभुता को प्रभावित नहीं कर सकती।
भारत लगातार यह कहता रहा है कि पाकिस्तान को अवैध कब्जा समाप्त कर इन क्षेत्रों को खाली करना चाहिए। भारत का मानना है कि चुनावों या अन्य प्रशासनिक कदमों से वास्तविक स्थिति नहीं बदलती।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बनी रहेगी भारत की नीति
विदेश मंत्रालय के ताजा बयान से साफ है कि भारत भविष्य में भी पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर को लेकर अपने रुख में कोई बदलाव नहीं करेगा। भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पूरी तरह भारत का हिस्सा हैं और इस स्थिति को कोई चुनाव या राजनीतिक प्रक्रिया बदल नहीं सकती।
पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में कराए जा रहे चुनावों को भारत ने पूरी तरह अस्वीकार करते हुए उन्हें अवैध कब्जे को वैध दिखाने की कोशिश बताया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि चुनाव कराने से क्षेत्र की संवैधानिक और कानूनी स्थिति नहीं बदल सकती। साथ ही भारत ने स्थानीय लोगों के अधिकारों और क्षेत्र में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा भी उठाया। यह बयान भारत की लंबे समय से चली आ रही आधिकारिक नीति की पुनर्पुष्टि माना जा रहा है।

