नई दिल्ली: करीब एक दशक से अधिक समय से चर्चा में रहे तलाबीरा-II कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई को समाप्त कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष अदालत द्वारा जारी समन को रद्द करते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली। इस फैसले के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ कोयला आवंटन मामले में लंबित कार्यवाही पूरी तरह समाप्त हो गई।
यह मामला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के कार्यकाल के दौरान ओडिशा स्थित तलाबीरा-II कोल ब्लॉक के आवंटन से जुड़ा था। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह के पास प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी था, जिसके कारण उनका नाम इस मामले में सामने आया था।
क्या था पूरा मामला?
कोयला ब्लॉक आवंटन विवाद देश के सबसे चर्चित मामलों में शामिल रहा है। आरोप लगाया गया था कि ओडिशा के तलाबीरा-II कोल ब्लॉक का आवंटन हिंडाल्को इंडस्ट्रीज को नियमों के विपरीत किया गया। इस मामले में उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारख और तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सहित कई लोगों के नाम सामने आए थे।
मामले की जांच के दौरान सीबीआई ने विस्तृत पड़ताल की और अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन चलाने योग्य मामला नहीं बनता।
ट्रायल कोर्ट ने समन जारी किया था
सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट के बावजूद वर्ष 2015 में दिल्ली की विशेष अदालत ने अलग रुख अपनाया। अदालत ने माना कि उपलब्ध दस्तावेजों और परिस्थितियों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं।
इसी आधार पर विशेष अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कुमार मंगलम बिड़ला, पी.सी. पारख और अन्य लोगों को समन जारी कर अदालत में पेश होने का आदेश दिया।
इस आदेश के बाद यह मामला राष्ट्रीय राजनीति और न्यायिक व्यवस्था दोनों में चर्चा का विषय बन गया।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे मनमोहन सिंह
ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए डॉ. मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि जब देश की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई स्वयं यह कह चुकी है कि अभियोजन योग्य कोई मामला नहीं बनता, तब विशेष अदालत द्वारा समन जारी करना कानून की दृष्टि से उचित नहीं है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बिना पर्याप्त साक्ष्यों के उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं होगा।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2015 में विशेष अदालत द्वारा जारी समन पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इस आदेश के बाद पूर्व प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश नहीं होना पड़ा और मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित रहा।
करीब 11 वर्षों तक यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में चलता रहा। इस दौरान विभिन्न कानूनी पहलुओं पर सुनवाई होती रही, लेकिन अंतिम निर्णय नहीं आ सका।
निधन के बाद आया अंतिम फैसला
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का 26 दिसंबर 2024 को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। उनके निधन के बाद भी मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन रहा।
अब सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष अदालत के समन को रद्द करते हुए सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली है। अदालत के इस फैसले के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही औपचारिक रूप से समाप्त हो गई।
इस निर्णय को लंबे समय से लंबित कानूनी विवाद का अंत माना जा रहा है।
क्या है इस फैसले का महत्व?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि यदि जांच एजेंसी पर्याप्त साक्ष्य न मिलने की बात कहती है, तो अदालत को उपलब्ध तथ्यों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना चाहिए।
हालांकि, प्रत्येक मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए इस फैसले को किसी अन्य मामले का सामान्य कानूनी आधार नहीं माना जा सकता।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि कोयला ब्लॉक आवंटन विवाद वर्षों तक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहा था।
कोयला आवंटन विवाद क्यों बना था चर्चा का विषय?
यूपीए सरकार के कार्यकाल में कोयला ब्लॉकों के आवंटन की प्रक्रिया को लेकर व्यापक विवाद खड़ा हुआ था। विपक्ष ने सरकार पर पारदर्शिता की कमी के आरोप लगाए थे, जबकि सरकार ने सभी आवंटनों को नियमों के अनुरूप बताया था।
बाद में कई मामलों की जांच सीबीआई और अन्य एजेंसियों द्वारा की गई। कुछ मामलों में अदालतों ने अलग-अलग निर्णय दिए, जबकि कई मामलों में साक्ष्यों के अभाव में कार्रवाई समाप्त कर दी गई।
तलाबीरा-II कोल ब्लॉक से जुड़ा यह मामला भी उन्हीं प्रमुख मामलों में शामिल था, जिसकी सुनवाई लंबे समय तक न्यायालय में चलती रही।

