‘FIR के लिए सीधे हाई कोर्ट नहीं, पहले पुलिस और मजिस्ट्रेट के पास जाएं’: गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

अहमदाबाद: से एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में गुजरात हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए सीधे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना उचित प्रक्रिया नहीं है। अदालत ने कहा कि किसी भी संज्ञेय अपराध के मामले में सबसे पहले पुलिस के पास जाना चाहिए और यदि वहां सुनवाई नहीं होती है, तो संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति डी.एन. राय ने हिरासत में मौत के एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें पुलिस पर एफआईआर दर्ज न करने का आरोप लगाते हुए सीधे हाई कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की गई थी।

क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता तौफिक शेख ने आरोप लगाया कि उनके पिता जहीरुद्दीन शेख की पुलिस हिरासत में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। उन्होंने दावा किया कि मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए पुलिस से संपर्क किया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राबिन भट्ट ने गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की और अदालत से एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देने की मांग की।

कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति डी.एन. राय ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में ऐसी स्थिति के लिए स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की गई है। यदि कोई व्यक्ति पुलिस के पास शिकायत करता है और एफआईआर दर्ज नहीं होती, तो उसके पास मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का वैधानिक अधिकार मौजूद है।

अदालत ने कहा कि न्याय पाने का पहला मंच पुलिस है। यदि वहां राहत नहीं मिलती तो कानून मजिस्ट्रेट के पास जाने का विकल्प देता है। इसलिए सीधे हाई कोर्ट में याचिका दायर करना उचित नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ मामले का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है।

हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि एफआईआर दर्ज नहीं होती है, तो उसके लिए कानून में अन्य उपाय मौजूद हैं और नागरिकों को उन्हीं कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना चाहिए।

इसके अलावा अदालत ने ‘सकरी वासु’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में पहले मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कराना अधिक उपयुक्त कानूनी रास्ता है।

सबूत सुरक्षित रखने का आदेश

हालांकि हाई कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए वेजलपुर पुलिस को महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए।

अदालत ने कहा कि मामले से जुड़े सभी महत्वपूर्ण साक्ष्य जैसे सीसीटीवी फुटेज, मेडिकल रिपोर्ट और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) सुरक्षित रखे जाएं ताकि जांच के दौरान किसी प्रकार की छेड़छाड़ या साक्ष्य नष्ट होने की आशंका न रहे।

कानूनी प्रक्रिया पर दिया महत्वपूर्ण संदेश

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आम नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट संदेश मिलता है कि न्याय पाने के लिए कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि हाई कोर्ट असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर सीधे एफआईआर दर्ज कराने के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

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