प्रधानमंत्री: नरेंद्र मोदी अपने विदेश दौरे के तीसरे चरण में फ्रांस के एवियां पहुंच रहे हैं, जहां वह G7 शिखर सम्मेलन 2026 में हिस्सा लेंगे। इस सम्मेलन में दुनिया की प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं के नेता वैश्विक चुनौतियों और रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा करेंगे। हालांकि भारत G7 का स्थायी सदस्य नहीं है, फिर भी प्रधानमंत्री मोदी को विशेष आमंत्रित नेता के रूप में बुलाया गया है। ऐसे में लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं—G7 आखिर है क्या? भारत इसमें क्या भूमिका निभाता है? और दुनिया की दो बड़ी शक्तियां रूस और चीन इसका हिस्सा क्यों नहीं हैं?
क्या है G7?
G7 यानी “ग्रुप ऑफ सेवन” दुनिया की सात सबसे विकसित और औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा शामिल हैं।
इस समूह की शुरुआत वर्ष 1975 में हुई थी। उस समय दुनिया तेल संकट, बढ़ती महंगाई और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रही थी। इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रमुख पश्चिमी देशों के नेताओं ने एक साझा मंच बनाया। 1976 में कनाडा के जुड़ने के बाद यह समूह G7 कहलाया।
शुरुआत में इसका उद्देश्य आर्थिक सहयोग और वित्तीय स्थिरता तक सीमित था, लेकिन समय के साथ इसके एजेंडे में जलवायु परिवर्तन, वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा संकट, आतंकवाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा और भू-राजनीतिक चुनौतियां भी शामिल हो गईं।
G7 कितना ताकतवर है?
दुनिया में केवल सात देशों का यह समूह वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर जबरदस्त प्रभाव रखता है। इन देशों की संयुक्त आर्थिक ताकत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है।
अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश वैश्विक वित्तीय संस्थाओं, तकनीकी विकास, सैन्य शक्ति और निवेश प्रवाह पर महत्वपूर्ण प्रभाव रखते हैं। यही वजह है कि G7 की बैठकों में लिए गए फैसले अक्सर वैश्विक बाजारों, तेल की कीमतों, व्यापार नीतियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करते हैं।
हालांकि पिछले दो दशकों में भारत, चीन और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के तेजी से विकास के कारण G7 की आर्थिक हिस्सेदारी पहले की तुलना में कम हुई है, लेकिन रणनीतिक और राजनीतिक प्रभाव अब भी बेहद मजबूत माना जाता है।

G7 Summit 2026 में क्या होंगे मुख्य मुद्दे?
फ्रांस की अध्यक्षता में आयोजित इस वर्ष के सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया की स्थिति, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
इसके अलावा AI के नियमन और भविष्य की तकनीकों को लेकर भी विस्तृत मंथन होगा। दुनिया के कई बड़े उद्योगपति, नीति निर्माता और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी इस आयोजन में भाग ले रहे हैं।
भारत की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत G7 का सदस्य नहीं है, लेकिन पिछले कई वर्षों से उसे लगातार विशेष आमंत्रित देश के रूप में बुलाया जा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक मंच पर बढ़ता प्रभाव है।
भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल तकनीक, ऊर्जा परिवर्तन, जलवायु नीति, वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज और भू-राजनीतिक संतुलन में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
प्रधानमंत्री मोदी सम्मेलन के दौरान G7 देशों के नेताओं, अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुखों और अन्य साझेदार देशों के प्रतिनिधियों के साथ कई महत्वपूर्ण बैठकों में हिस्सा लेंगे। माना जा रहा है कि वह भारत के विकास मॉडल, तकनीकी नवाचार और वैश्विक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखेंगे।
रूस और चीन G7 में क्यों नहीं हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और रूस एक बड़ी सैन्य शक्ति है, तो वे G7 में क्यों शामिल नहीं हैं?
दरअसल G7 मूल रूप से पश्चिमी लोकतांत्रिक और विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। चीन को कभी सदस्यता नहीं दी गई क्योंकि वह इस समूह के गठन के समय विकसित पश्चिमी देशों की श्रेणी में नहीं था। बाद में चीन की आर्थिक ताकत बढ़ी, लेकिन G7 का ढांचा नहीं बदला।
रूस की बात करें तो वह 1998 में G8 के रूप में इस समूह में शामिल हुआ था। लेकिन 2014 में क्रीमिया पर कब्जे के बाद पश्चिमी देशों ने रूस की सदस्यता निलंबित कर दी। इसके बाद समूह फिर से G7 बन गया।
आज रूस और चीन दोनों G7 के सदस्य नहीं हैं, हालांकि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है।
ट्रंप और मोदी की मुलाकात पर नजर
G7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संभावित मुलाकात पर भी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। इसके अलावा कनाडा, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं के साथ भी उनकी द्विपक्षीय बैठकें प्रस्तावित हैं।
इन बैठकों में व्यापार, रक्षा सहयोग, निवेश, तकनीकी साझेदारी और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।