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    Home»गुजरात»14 साल से बेटे के लिए लड़ रहा था पिता, फिर उसी जगह उठाया खौफनाक कदम; थानगढ़ फायरिंग ने फिर खड़े किए पुराने सवाल
    गुजरात

    14 साल से बेटे के लिए लड़ रहा था पिता, फिर उसी जगह उठाया खौफनाक कदम; थानगढ़ फायरिंग ने फिर खड़े किए पुराने सवाल

    Chandra JyotiBy Chandra JyotiSeptember 1, 2026No Comments4 Mins Read
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    अहमदाबाद। गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले में 2012 की थानगढ़ पुलिस फायरिंग की घटना एक बार फिर चर्चा में आ गई है। इस बार वजह उस घटना से जुड़ी एक ऐसी दर्दनाक घटना है, जिसने 14 साल पुराने न्याय के सवालों को फिर सामने ला दिया है। अपने बेटे की मौत के बाद लंबे समय से न्याय की लड़ाई लड़ रहे 53 वर्षीय अमरशीभाई सुमरा की मौत हो गई। परिजनों के अनुसार, उन्होंने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या की।

    सबसे भावुक करने वाली बात यह है कि जिस इलाके में उन्होंने अपनी जान दी, वह वही क्षेत्र है जहां करीब 14 साल पहले उनके 16 वर्षीय बेटे पंकज सुमरा की पुलिस फायरिंग में मौत हुई थी। अमरशीभाई के निधन के बाद परिवार और स्थानीय लोगों के बीच एक बार फिर 2012 की उस घटना को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    बेटे की मौत के बाद शुरू हुई थी 14 साल लंबी लड़ाई

    अमरशीभाई सुमरा के परिवार के अनुसार, सितंबर 2012 में थानगढ़ के तरणेतर मेले के दौरान विवाद के बाद हिंसक स्थिति पैदा हुई थी। इसके बाद पुलिस की ओर से फायरिंग की गई थी।

    इस घटना में मेहुल राठौड़, पंकज सुमरा और प्रकाश परमार नाम के तीन दलित युवकों की मौत हुई थी। पंकज की उम्र उस समय महज 16 वर्ष थी।

    बेटे की मौत के बाद अमरशीभाई लगातार न्याय की मांग करते रहे। परिवार का आरोप रहा है कि इतने वर्षों के बाद भी उन्हें उस मामले में अपेक्षित न्याय नहीं मिला।

    उसी इलाके में ट्रेन के आगे दी जान

    परिजनों के मुताबिक, अमरशीभाई ने रात के समय थानगढ़ और लखमांची के बीच चलने वाली हापा-मुंबई ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली।

    बताया गया है कि यह स्थान उस इलाके के नजदीक है, जहां 2012 की फायरिंग में उनके बेटे की मौत हुई थी। घटना की जानकारी मिलने के बाद रेलवे पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर आवश्यक कार्रवाई शुरू की।

    अमरशीभाई की मौत ने परिवार के पुराने जख्मों को फिर ताजा कर दिया है। एक पिता, जिसने अपने बेटे की मौत के बाद वर्षों तक न्याय की उम्मीद में संघर्ष किया, उसकी इसी संघर्ष के बीच मौत ने मामले को एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा में ला दिया है।

    पुलिस फायरिंग के बाद गठित हुई थी एसआईटी

    2012 की घटना के बाद पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठे थे। घटना को लेकर विरोध और आक्रोश बढ़ने के बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया था।

    एसआईटी ने थानगढ़ पहुंचकर घटनास्थल का निरीक्षण किया था। जांच टीम ने मेला मैदान और रेलवे गेट समेत संबंधित स्थानों की माप-तौल की थी। फायरिंग किस स्थान से हुई और घटना के दौरान परिस्थितियां क्या थीं, इसका पता लगाने के लिए इलाके की वीडियोग्राफी भी कराई गई थी।

    हालांकि, मृतकों के परिवारों की ओर से यह दावा किया जाता रहा है कि जांच से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों के जवाब उन्हें अब तक नहीं मिले हैं।

    14 साल बाद भी परिवार को न्याय का इंतजार

    परिजनों का कहना है कि 2012 में हुई घटना को लंबा समय बीत चुका है, लेकिन न्याय की उनकी लड़ाई खत्म नहीं हुई। परिवार का आरोप है कि जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया।

    अमरशीभाई के लिए यह मामला केवल कानूनी लड़ाई नहीं था। उनके लिए यह अपने बेटे की मौत का जवाब पाने का संघर्ष था। वर्षों तक उन्होंने संबंधित अधिकारियों और व्यवस्था के सामने अपनी बात रखी और न्याय की मांग जारी रखी।

    रक्षाबंधन के बाद बढ़ा मानसिक दबाव

    परिवार के मुताबिक, इस वर्ष रक्षाबंधन के मौके पर अपनी बेटियों को उनके दिवंगत भाई पंकज की याद में भावुक देखकर अमरशीभाई बेहद परेशान हो गए थे। बेटे की मौत और वर्षों से जारी न्याय की प्रतीक्षा का दर्द उनके लिए लगातार बना हुआ था।

    परिवार का मानना है कि लंबे समय से चले आ रहे इस संघर्ष और मानसिक पीड़ा ने उनकी स्थिति को बेहद प्रभावित किया।

    हालांकि, किसी व्यक्ति की आत्महत्या के पीछे के कारणों को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकता है। रेलवे पुलिस घटना की जांच कर रही है और संबंधित परिस्थितियों की जानकारी जुटाई जा रही है।

    फिर उठे 2012 की फायरिंग पर सवाल

    अमरशीभाई की मौत ने थानगढ़ फायरिंग मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। सवाल यह है कि 14 साल पुराने इस मामले में जांच और न्याय की प्रक्रिया कहां तक पहुंची और मृतकों के परिवारों को अब तक क्या मिला।

    एक पिता की मौत ने उस घटना से जुड़े परिवारों के पुराने दर्द को फिर सामने ला दिया है। अब निगाहें जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर हैं कि अमरशीभाई की मौत की परिस्थितियां क्या थीं और 2012 की घटना से जुड़े लंबित सवालों का जवाब कब मिलेगा।

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