उज्जैन। मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में इन दिनों एक प्राचीन हनुमान मंदिर को लेकर आस्था, इतिहास और प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच दिलचस्प स्थिति बनी हुई है। सड़क चौड़ीकरण की जद में आए खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह स्थापित करने की प्रशासनिक कोशिशें लगातार चुनौती बन रही हैं।
मंदिर का गर्भगृह और मुख्य ढांचा तोड़ा जा चुका है, लेकिन प्रतिमा को अपने स्थान से हटाना आसान साबित नहीं हुआ। स्थानीय लोगों और साधु-संतों का दावा है कि प्रतिमा को हटाने के लिए कई बार प्रयास किए गए, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिली। इसी को संत और श्रद्धालु आस्था से जोड़कर देख रहे हैं और इसे चमत्कार बता रहे हैं।
हालांकि, तकनीकी विशेषज्ञों की नजर में इसके पीछे प्रतिमा की प्राचीन स्थापना तकनीक और उसके आधार की संरचना महत्वपूर्ण हो सकती है। अब प्रशासन जल्दबाजी के बजाय विशेषज्ञों की मदद से आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है।
चार बार कोशिश, फिर भी नहीं हिली प्रतिमा
कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण का काम प्रस्तावित है। इसी प्रक्रिया में प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर का ढांचा भी इसकी जद में आया है।
प्रतिमा को हटाकर सुरक्षित स्थान पर स्थापित करने के लिए कई प्रयास किए गए। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक करीब चार बार कोशिश की जा चुकी है, लेकिन प्रतिमा को उसके स्थान से हटाया नहीं जा सका।
मंदिर का भवन टूटने के बाद फिलहाल प्रतिमा को कैनोपी टेंट के नीचे सुरक्षित रखा गया है। मंदिर के बाहर स्थानीय श्रद्धालुओं ने एक चेतावनी भरा पोस्टर भी लगाया है। इसमें कहा गया है कि प्रतिमा को हटाने के दौरान यदि उसे किसी तरह का नुकसान पहुंचता है तो इसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
संत बोले- ‘बाबा खुद संकेत दे रहे हैं’
प्रतिमा को हटाने में आ रही परेशानी के बाद मंदिर से जुड़े साधु-संत और श्रद्धालु इसे अपनी आस्था से जोड़ रहे हैं।
मंदिर के सेवादार और पुजारी महेश पंडित (बैरागी) का कहना है कि उन्हें लगातार ऐसा महसूस हो रहा है कि बाबा संकेत दे रहे हैं कि उन्हें इसी स्थान पर रहना है।
मंदिर के बाहर जुटे कई श्रद्धालुओं का भी यही कहना है कि प्रतिमा का अपने स्थान से न हटना उनके लिए आस्था का विषय है। कुछ श्रद्धालुओं ने मंदिर से जुड़े अपने पुराने अनुभव भी साझा किए हैं।
हालांकि, प्रतिमा के नहीं हटने को लेकर वैज्ञानिक या तकनीकी कारणों की जांच अभी पूरी नहीं हुई है। इसलिए इसे चमत्कार मानना धार्मिक आस्था का विषय है, जबकि प्रतिमा की संरचना और स्थापना तकनीक का तथ्यात्मक मूल्यांकन विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।

पुरातत्वविद् ने बताई प्राचीन तकनीक
विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार, यह प्रतिमा मालवा क्षेत्र में पाए जाने वाले विशेष बेसाल्ट पत्थर से बनी बताई जाती है। उन्होंने इसे परमार काल और राजा भोज के समय की शिल्प परंपरा से जोड़ते हुए इसके ऐतिहासिक महत्व की ओर ध्यान दिलाया है।
डॉ. सोलंकी के अनुसार, प्राचीन समय में आज की तरह आधुनिक मशीनें और तकनीक उपलब्ध नहीं थीं। उस दौर के शिल्पकार और इंजीनियर पत्थरों की संरचना और लॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल करके मंदिरों और प्रतिमाओं को स्थापित करते थे।
ऐसे में संभव है कि प्रतिमा जिस आधार पर स्थापित है, उसकी संरचना को समझे बिना उसे सीधे हटाने की कोशिश करना मुश्किल साबित हो।
प्रशासन को विशेषज्ञों से सलाह लेने का सुझाव
पुरातत्वविद् ने सुझाव दिया है कि प्रतिमा को विस्थापित या पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया में मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के विशेषज्ञों से सलाह ली जानी चाहिए।
उनका कहना है कि प्राचीन प्रतिमाओं को सुरक्षित तरीके से हटाने और पुनर्स्थापित करने के लिए विशेषज्ञ तकनीकी मार्गदर्शन जरूरी है। इससे प्रतिमा को नुकसान पहुंचने की आशंका को कम किया जा सकता है।
यही वजह है कि प्रशासन अब जल्दबाजी में प्रतिमा को हटाने के बजाय उसकी संरचना और आधार को समझने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
अब अत्याधुनिक मशीनों से होगी स्कैनिंग
प्रतिमा के आधार की स्थिति जानने के लिए उसके नीचे करीब डेढ़ फीट गहरा गड्ढा खोदा गया है। अब नगर निगम और जिला प्रशासन विशेषज्ञों की मदद से प्रतिमा के आधार, अंदरूनी संरचना और आसपास की मिट्टी की जांच कराने की तैयारी में है।
आर्कियोलॉजिस्ट की टीम अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से स्कैनिंग करेगी। इसके बाद रिपोर्ट तैयार की जाएगी और उसी के आधार पर यह तय किया जाएगा कि प्रतिमा को किस तकनीक से हटाया या स्थानांतरित किया जा सकता है।
यानी अब इस पूरे मामले में अगला बड़ा कदम स्कैनिंग रिपोर्ट होगी।
स्थानीय लोगों की मांग- यहीं बनाया जाए मंदिर
स्थानीय श्रद्धालुओं और नागरिकों का एक वर्ग प्रतिमा को दूसरी जगह ले जाने के पक्ष में नहीं है। उनका कहना है कि मंदिर की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता को देखते हुए इसी स्थान पर मंदिर का पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए।
स्थानीय लोगों का दावा है कि इस प्राचीन मंदिर का संबंध 1857 की क्रांति से भी पहले के दौर से रहा है। ऐसे में उनके अनुसार मंदिर को हटाने के बजाय सड़क चौड़ीकरण की योजना में वैकल्पिक समाधान तलाशा जाना चाहिए।
दूसरी ओर, प्रशासन के सामने सड़क चौड़ीकरण और सिंहस्थ-2028 की तैयारियों से जुड़े विकास कार्यों को आगे बढ़ाने की चुनौती है।
आस्था, इतिहास और तकनीक के बीच अटका फैसला
उज्जैन का खड़े हनुमान मंदिर अब केवल सड़क चौड़ीकरण से जुड़ा मामला नहीं रह गया है। एक तरफ श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है, दूसरी तरफ मंदिर और प्रतिमा की ऐतिहासिक विरासत का सवाल है। वहीं प्रशासन के सामने विकास कार्य को पूरा करने की जिम्मेदारी है।
अब सभी की नजर विशेषज्ञों की जांच और स्कैनिंग रिपोर्ट पर टिकी है। रिपोर्ट सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रतिमा को किस तकनीक से सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित किया जा सकता है या फिर प्रशासन को कोई वैकल्पिक रास्ता तलाशना होगा।

