नई दिल्ली। रूस और यूक्रेन के बीच करीब साढ़े चार साल से जारी युद्ध को खत्म कराने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों के बीच नई दिल्ली से एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत सामने आया है। BRICS Summit 2026 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस-यूक्रेन शांति प्रक्रिया में मदद करने की इच्छा जताई है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव के मुताबिक, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दोनों नेताओं की इस पेशकश का स्वागत किया है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका की ओर से रूस और यूक्रेन के बीच समझौते की कोशिशों के बावजूद युद्ध समाप्त करने को लेकर अब तक कोई निर्णायक सफलता नहीं मिल पाई है। ऐसे में भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों का संभावित कूटनीतिक योगदान शांति प्रक्रिया को एक अलग दिशा दे सकता है।
मोदी और शी ने क्या पेशकश की?
क्रेमलिन के मुताबिक, नई दिल्ली में हुई बातचीत के दौरान मोदी और शी ने यूक्रेन संघर्ष की स्थिति को समझने में रुचि दिखाई और समाधान खोजने में अपनी मदद की पेशकश की।
पेसकोव ने कहा कि पुतिन ने दोनों नेताओं की मदद करने की इच्छा का स्वागत किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई औपचारिक मध्यस्थता शुरू हो गई है या युद्ध समाप्त करने का समझौता तैयार हो चुका है। फिलहाल इसे कूटनीतिक समर्थन और शांति प्रक्रिया में संभावित भूमिका की पेशकश के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।
मोदी पहले भी दे चुके हैं शांति का संदेश
यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत का रुख लंबे समय से स्पष्ट रहा है। नई दिल्ली लगातार कहता रहा है कि संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए।
11 सितंबर को BRICS Summit से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी। इस बैठक में भी उन्होंने संघर्षों को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से हल करने की बात दोहराई और भारत की शांति प्रयासों में सहायता की तैयारी जताई।
भारत ने रूस के साथ अपने पारंपरिक रणनीतिक संबंध बनाए रखने के साथ-साथ यूक्रेन के साथ भी संपर्क कायम रखा है। यही संतुलन भविष्य में किसी संभावित संवाद में भारत को उपयोगी भूमिका दे सकता है।
रूस ने भारत के रुख का पहले भी किया है स्वागत
BRICS Summit से पहले ही क्रेमलिन ने भारत के शांति प्रयासों को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया था। पेसकोव ने कहा था कि रूस शांतिपूर्ण समाधान चाहता है और यूक्रेन संघर्ष के समाधान में भारत के योगदान का स्वागत करता है।
इसलिए मोदी की ओर से शांति प्रक्रिया में मदद की पेशकश अचानक सामने आया कोई बिल्कुल नया रुख नहीं है। हालांकि, अब इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भूमिका जुड़ने से घटनाक्रम का कूटनीतिक महत्व बढ़ गया है।

मोदी-शी-पुतिन की मुलाकात ने बढ़ाया सस्पेंस
BRICS Summit में मोदी, शी जिनपिंग और पुतिन की मौजूदगी ने भी वैश्विक स्तर पर खास ध्यान खींचा। भारत-चीन संबंधों में लंबे समय बाद सुधार के संकेतों और रूस के साथ भारत के मजबूत रिश्तों के बीच तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की बातचीत को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मोदी और शी के बीच भी नई दिल्ली में अहम द्विपक्षीय बातचीत हुई। दोनों नेताओं ने भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने और मतभेदों को विवाद में बदलने से रोकने पर जोर दिया।
यही बदलता कूटनीतिक माहौल रूस-यूक्रेन संकट में भारत और चीन की संभावित भूमिका को और दिलचस्प बना रहा है।
ट्रंप की कोशिशों के बीच क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के लिए कूटनीतिक प्रयास किए हैं। लेकिन बातचीत को निर्णायक समझौते तक पहुंचाना अब तक मुश्किल साबित हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में रूस की ओर से मोदी और शी की मदद की पेशकश का स्वागत किए जाने को महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि मोदी और शी ट्रंप की कोशिशों से आगे निकल चुके हैं या वे निश्चित रूप से युद्ध खत्म करा देंगे। रूस और यूक्रेन के बीच कई गंभीर मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं और किसी भी शांति समझौते के लिए दोनों पक्षों की सहमति जरूरी होगी।
भारत की भूमिका क्यों बन सकती है अहम?
भारत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसके रूस के साथ लंबे समय से मजबूत संबंध हैं, जबकि नई दिल्ली यूक्रेन के साथ भी राजनयिक संपर्क बनाए हुए है। भारत ने युद्ध के दौरान कई बार दोनों पक्षों से बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है।
इसके अलावा भारत खुद को किसी एक शक्ति खेमे तक सीमित रखने के बजाय संवाद और रणनीतिक संतुलन की नीति पर जोर देता रहा है। यही कारण है कि रूस भारत की बात को गंभीरता से लेता है और पश्चिमी देश भी भारत की संभावित कूटनीतिक भूमिका पर नजर रखते हैं।
क्या सच में खत्म हो सकता है रूस-यूक्रेन युद्ध?
फिलहाल इसका जवाब देना मुश्किल है। मोदी और शी की पेशकश निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम है, लेकिन युद्ध खत्म करने के लिए सिर्फ मध्यस्थता की पेशकश पर्याप्त नहीं होगी।
सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि रूस और यूक्रेन वास्तविक बातचीत की मेज पर किन शर्तों के साथ बैठते हैं। क्षेत्रीय नियंत्रण, सुरक्षा गारंटी और भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था जैसे मुद्दे किसी भी शांति समझौते में बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

